श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.22.10

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

अधना१ अपि ते धन्याः साधवो गृहमेधिनः।

यद‍्गृहा ह्यर्हवर्याम्बुतृणभूमीश्‍वरावराः२॥ १०

adhanā api te dhanyāḥ sādhavo gṛhamedhinaḥ|

yadgṛhā hyarhavaryāmbutṛṇabhūmīśvarāvarāḥ|| 10

अर्थ

जिनके घरोंमें आप-जैसे पूज्य पुरुष उनके जल, तृण, पृथ्वी, गृहस्वामी अथवा सेवकादि किसी अन्य पदार्थको स्वीकार कर लेते हैं, वे गृहस्थ धनहीन होनेपर भी धन्य हैं॥ १०॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—अधन्या।

    (मुद्रित पृष्ठ 513)
  2. २

    प्रा० पा०—श्‍वराश्‍चराः।

    (मुद्रित पृष्ठ 513)

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