जिन घरोंमें कभी भगवद्भक्तोंके परमपवित्र चरणोदकके छींटे नहीं पड़े, वे सब प्रकारकी ऋद्धि-सिद्धियोंसे भरे होनेपर भी ऐसे वृक्षोंके समान हैं कि जिनपर साँप रहते हैं॥ ११॥
व्यालालयद्रुमा वै तेऽप्यरिक्ताखिलसम्पदः।
यद्गृहास्तीर्थपादीयपादतीर्थविवर्जिताः॥ ११
जिन घरोंमें कभी भगवद्भक्तोंके परमपवित्र चरणोदकके छींटे नहीं पड़े, वे सब प्रकारकी ऋद्धि-सिद्धियोंसे भरे होनेपर भी ऐसे वृक्षोंके समान हैं कि जिनपर साँप रहते हैं॥ ११॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.22.11 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 513) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/22/11/