श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.22.12

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

स्वागतं वो द्विजश्रेष्ठा यद्व्रतानि मुमुक्षवः।

चरन्ति श्रद्धया धीरा बाला एव बृहन्ति च४॥ १२

svāgataṃ vo dvijaśreṣṭhā yadvratāni mumukṣavaḥ|

caranti śraddhayā dhīrā bālā eva bṛhanti ca|| 12

अर्थ

मुनीश्‍वरो! आपका स्वागत है। आपलोग तो बाल्यावस्थासे ही मुमुक्षुओंके मार्गका अनुसरण करते हुए एकाग्रचित्तसे ब्रह्मचर्यादि महान् व्रतोंका बड़ी श्रद्धापूर्वक आचरण कर रहे हैं॥ १२॥

टिप्पणियाँ

  1. ४

    प्रा० पा०—वै।

    (मुद्रित पृष्ठ 513)

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