मुनीश्वरो! आपका स्वागत है। आपलोग तो बाल्यावस्थासे ही मुमुक्षुओंके मार्गका अनुसरण करते हुए एकाग्रचित्तसे ब्रह्मचर्यादि महान् व्रतोंका बड़ी श्रद्धापूर्वक आचरण कर रहे हैं॥ १२॥
स्वागतं वो द्विजश्रेष्ठा यद्व्रतानि मुमुक्षवः।
चरन्ति श्रद्धया धीरा बाला एव बृहन्ति च॥ १२
मुनीश्वरो! आपका स्वागत है। आपलोग तो बाल्यावस्थासे ही मुमुक्षुओंके मार्गका अनुसरण करते हुए एकाग्रचित्तसे ब्रह्मचर्यादि महान् व्रतोंका बड़ी श्रद्धापूर्वक आचरण कर रहे हैं॥ १२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.22.12 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 513) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/22/12/