श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.22.13

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

कच्चिन्‍नः कुशलं नाथा इन्द्रियार्थार्थवेदिनाम्।

व्यसनावाप एतस्मिन् पतितानां स्वकर्मभिः॥ १३

kaccinnaḥ kuśalaṃ nāthā indriyārthārthavedinām|

vyasanāvāpa etasmin patitānāṃ svakarmabhiḥ|| 13

अर्थ

स्वामियो! हमलोग अपने कर्मोंके वशीभूत होकर विपत्तियोंके क्षेत्ररूप इस संसारमें पड़े हुए केवल इन्द्रियसम्बन्धी भोगोंको ही परम पुरुषार्थ मान रहे हैं; सो क्या हमारे निस्तारका भी कोई उपाय है॥ १३॥

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