श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.22.14

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

भवत्सु कुशलप्रश्न आत्मारामेषु नेष्यते।

कुशलाकुशला यत्र न सन्ति मतिवृत्तयः॥ १४

bhavatsu kuśalapraśna ātmārāmeṣu neṣyate|

kuśalākuśalā yatra na santi mativṛttayaḥ|| 14

अर्थ

आपलोगोंसे कुशलप्रश्न करना उचित नहीं है, क्योंकि आप निरन्तर आत्मामें ही रमण करते हैं। आपमें यह कुशल है और यह अकुशल है—इस प्रकारकी वृत्तियाँ कभी होती ही नहीं॥ १४॥

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