वास्तवमें तो सेनापतित्व, राज्य, दण्डविधान और सम्पूर्ण लोकोंके शासनका अधिकार वेद-शास्त्रोंके ज्ञाता ब्राह्मणोंको ही है॥ ४५॥
सैनापत्यं च राज्यं च दण्डनेतृत्वमेव च।
सर्वलोकाधिपत्यं च वेदशास्त्रविदर्हति॥ ४५
वास्तवमें तो सेनापतित्व, राज्य, दण्डविधान और सम्पूर्ण लोकोंके शासनका अधिकार वेद-शास्त्रोंके ज्ञाता ब्राह्मणोंको ही है॥ ४५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.22.45 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 517) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/22/45/