श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.22.46

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

स्वमेव ब्राह्मणो भुङ्क्ते स्वं वस्ते स्वं ददाति च।

तस्यैवानुग्रहेणान्‍नं भुंजते क्षत्रियादयः॥ ४६

svameva brāhmaṇo bhuṅkte svaṃ vaste svaṃ dadāti ca|

tasyaivānugraheṇānnaṃ bhuṃjate kṣatriyādayaḥ|| 46

अर्थ

ब्राह्मण अपना ही खाता है, अपना ही पहनता है और अपनी ही वस्तु दान देता है। दूसरे—क्षत्रिय आदि तो उसीकी कृपासे अन्‍न खानेको पाते हैं॥ ४६॥

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