ब्राह्मण अपना ही खाता है, अपना ही पहनता है और अपनी ही वस्तु दान देता है। दूसरे—क्षत्रिय आदि तो उसीकी कृपासे अन्न खानेको पाते हैं॥ ४६॥
स्वमेव ब्राह्मणो भुङ्क्ते स्वं वस्ते स्वं ददाति च।
तस्यैवानुग्रहेणान्नं भुंजते क्षत्रियादयः॥ ४६
ब्राह्मण अपना ही खाता है, अपना ही पहनता है और अपनी ही वस्तु दान देता है। दूसरे—क्षत्रिय आदि तो उसीकी कृपासे अन्न खानेको पाते हैं॥ ४६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.22.46 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 517) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/22/46/