श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! फिर आदिराज पृथुने आत्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ सनकादिकी पूजा की और वे उनके शीलकी प्रशंसा करते हुए सब लोगोंके सामने ही आकाशमार्गसे चले गये॥ ४८॥
त आत्मयोगपतय आदिराजेन पूजिताः।
शीलं तदीयं शंसन्तः खेऽभूवन्मिषतां नृणाम्॥ ४८
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! फिर आदिराज पृथुने आत्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ सनकादिकी पूजा की और वे उनके शीलकी प्रशंसा करते हुए सब लोगोंके सामने ही आकाशमार्गसे चले गये॥ ४८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.22.48 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 517) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/22/48/