श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.22.49

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

वैन्यस्तु धुर्यो महतां संस्थित्याध्यात्मशिक्षया।

आप्तकाममिवात्मानं मेन आत्मन्यवस्थितः॥ ४९

vainyastu dhuryo mahatāṃ saṃsthityādhyātmaśikṣayā|

āptakāmamivātmānaṃ mena ātmanyavasthitaḥ|| 49

अर्थ

महात्माओंमें अग्रगण्य महाराज पृथु उनसे आत्मोपदेश पाकर चित्तकी एकाग्रतासे आत्मामें ही स्थित रहनेके कारण अपनेको कृतकृत्य-सा अनुभव करने लगे॥ ४९॥

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