॥ श्रीहरिः ॥
वैन्यस्तु धुर्यो महतां संस्थित्याध्यात्मशिक्षया।
आप्तकाममिवात्मानं मेन आत्मन्यवस्थितः॥ ४९
vainyastu dhuryo mahatāṃ saṃsthityādhyātmaśikṣayā|
āptakāmamivātmānaṃ mena ātmanyavasthitaḥ|| 49
अर्थ
महात्माओंमें अग्रगण्य महाराज पृथु उनसे आत्मोपदेश पाकर चित्तकी एकाग्रतासे आत्मामें ही स्थित रहनेके कारण अपनेको कृतकृत्य-सा अनुभव करने लगे॥ ४९॥
वैन्यस्तु धुर्यो महतां संस्थित्याध्यात्मशिक्षया।
आप्तकाममिवात्मानं मेन आत्मन्यवस्थितः॥ ४९
महात्माओंमें अग्रगण्य महाराज पृथु उनसे आत्मोपदेश पाकर चित्तकी एकाग्रतासे आत्मामें ही स्थित रहनेके कारण अपनेको कृतकृत्य-सा अनुभव करने लगे॥ ४९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.22.49 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 517) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/22/49/