इस प्रकार आत्मनिष्ठामें स्थित होकर सभी कर्तव्यकर्मोंका यथोचित रीतिसे अनुष्ठान करते हुए उन्होंने अपनी भार्या अर्चिके गर्भसे अपने अनुरूप पाँच पुत्र उत्पन्न किये॥ ५३॥
एवमध्यात्मयोगेन कर्माण्यनुसमाचरन्।
पुत्रानुत्पादयामास पंचार्चिष्यात्मसम्मतान्॥ ५३
इस प्रकार आत्मनिष्ठामें स्थित होकर सभी कर्तव्यकर्मोंका यथोचित रीतिसे अनुष्ठान करते हुए उन्होंने अपनी भार्या अर्चिके गर्भसे अपने अनुरूप पाँच पुत्र उत्पन्न किये॥ ५३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.22.53 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 518) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/22/53/