श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.22.54

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

विजिताश्‍वं धूम्रकेशं हर्यक्षं द्रविणं वृकम्।

सर्वेषां लोकपालानां दधारैकः पृथुर्गुणान्॥ ५४

vijitāśvaṃ dhūmrakeśaṃ haryakṣaṃ draviṇaṃ vṛkam|

sarveṣāṃ lokapālānāṃ dadhāraikaḥ pṛthurguṇān|| 54

अर्थ

उनके नाम विजिताश्‍व, धूम्रकेश, हर्यक्ष, द्रविण और वृक थे। महाराज पृथु भगवान्‌के अंश थे। वे समय-समयपर, जब-जब आवश्यक होता था, जगत‍्के प्राणियोंकी रक्षाके लिये अकेले ही समस्त लोकपालोंके गुण धारण कर लिया करते थे। अपने उदार मन, प्रिय और हितकर वचन, मनोहर मूर्ति और सौम्य गुणोंके द्वारा प्रजाका रंजन करते रहनेसे दूसरे चन्द्रमाके समान उनका ‘राजा’ यह नाम सार्थक हुआ। सूर्य जिस प्रकार गरमीमें पृथ्वीका जल खींचकर वर्षाकालमें उसे पुनः पृथ्वीपर बरसा देता है तथा अपनी किरणोंसे सबको ताप पहुँचाता है, उसी प्रकार वे कररूपसे प्रजाका धन लेकर उसे दुष्कालादिके समय मुक्तहस्तसे प्रजाके हितमें लगा देते थे तथा सबपर अपना प्रभाव जमाये रखते थे॥ ५४—५६॥

यह अर्थ श्लोक 54–56 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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