शारीरिक बल, इन्द्रियोंकी पटुता तथा पराक्रममें सर्वत्र गतिशील वायुके समान और तेजकी असह्यतामें भगवान् शंकरके समान थे॥ ६०॥
मातरिश्वेव सर्वात्मा बलेन सहसौजसा।
अविषह्यतया देवो भगवान् भूतराडिव॥ ६०
शारीरिक बल, इन्द्रियोंकी पटुता तथा पराक्रममें सर्वत्र गतिशील वायुके समान और तेजकी असह्यतामें भगवान् शंकरके समान थे॥ ६०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.22.60 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 519) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/22/60/