श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.22.62

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

बृहस्पतिर्ब्रह्मवादे आत्मवत्त्वे स्वयं हरिः।

भक्‍त्या गोगुरुविप्रेषु विष्वक्सेनानुवर्तिषु।

ह्रिया प्रश्रयशीलाभ्यामात्मतुल्यः परोद्यमे॥ ६२

bṛhaspatirbrahmavāde ātmavattve svayaṃ hariḥ|

bhaktyā goguruvipreṣu viṣvaksenānuvartiṣu|

hriyā praśrayaśīlābhyāmātmatulyaḥ parodyame|| 62

अर्थ

ब्रह्मविचारमें बृहस्पति, इन्द्रियजयमें साक्षात् श्रीहरि तथा गौ, ब्राह्मण, गुरुजन एवं भगवद्भक्तोंकी भक्ति, लज्जा, विनय, शील एवं परोपकार आदि गुणोंमें अपने ही समान (अनुपम) थे॥ ६२॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें