लोग त्रिलोकीमें सर्वत्र उच्च स्वरसे उनकी कीर्तिका गान करते थे, इससे वे स्त्रियोंतकके कानोंमें वैसे ही प्रवेश पाये हुए थे जैसे सत्पुरुषोंके हृदयमें श्रीराम॥ ६३॥
कीर्त्योर्ध्वगीतया पुम्भिस्त्रैलोक्ये तत्र तत्र ह।
प्रविष्टः कर्णरन्ध्रेषु स्त्रीणां रामः सतामिव॥ ६३
लोग त्रिलोकीमें सर्वत्र उच्च स्वरसे उनकी कीर्तिका गान करते थे, इससे वे स्त्रियोंतकके कानोंमें वैसे ही प्रवेश पाये हुए थे जैसे सत्पुरुषोंके हृदयमें श्रीराम॥ ६३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.22.63 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 519) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/22/63/