॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.23.14
सम्पीड्य पायुं पार्ष्णिभ्यां वायुमुत्सारयञ्छनैः।
नाभ्यां कोष्ठेष्ववस्थाप्य हृदुरःकण्ठशीर्षणि॥ १४
sampīḍya pāyuṃ pārṣṇibhyāṃ vāyumutsārayañchanaiḥ|
nābhyāṃ koṣṭheṣvavasthāpya hṛduraḥkaṇṭhaśīrṣaṇi|| 14
अर्थ
उन्होंने एड़ीसे गुदाके द्वारको रोककर प्राणवायुको धीरे-धीरे मूलाधारसे ऊपरकी ओर उठाते हुए उसे क्रमशः नाभि, हृदय, वक्षःस्थल, कण्ठ और मस्तकमें स्थित किया॥ १४॥