श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.23.31

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

य इदं सुमहत्पुण्यं श्रद्धयावहितः पठेत्।

श्रावयेच्छृणुयाद्वापि स पृथोः पदवीमियात्॥ ३१

ya idaṃ sumahatpuṇyaṃ śraddhayāvahitaḥ paṭhet|

śrāvayecchṛṇuyādvāpi sa pṛthoḥ padavīmiyāt|| 31

अर्थ

जो पुरुष इस परम पवित्र चरित्रको श्रद्धापूर्वक (निष्कामभावसे) एकाग्रचित्तसे पढ़ता, सुनता अथवा सुनाता है—वह भी महाराज पृथुके पद—भगवान्‌के परमधामको प्राप्त होता है॥ ३१॥✎ 411

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #411 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में

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