इसका सकामभावसे पाठ करनेसे ब्राह्मण ब्रह्मतेज प्राप्त करता है, क्षत्रिय पृथ्वीपति हो जाता है, वैश्य व्यापारियोंमें प्रधान हो जाता है और शूद्रमें साधुता आ जाती है॥ ३२॥✎ 411
ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चस्वी राजन्यो जगतीपतिः।
वैश्यः पठन् विट्पतिः स्याच्छूद्रः सत्तमतामियात्॥ ३२
इसका सकामभावसे पाठ करनेसे ब्राह्मण ब्रह्मतेज प्राप्त करता है, क्षत्रिय पृथ्वीपति हो जाता है, वैश्य व्यापारियोंमें प्रधान हो जाता है और शूद्रमें साधुता आ जाती है॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.23.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 523) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/23/32/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#411 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्में