जो पुरुष इस पृथु-चरितका प्रतिदिन आदरपूर्वक निष्कामभावसे श्रवण और कीर्तन करता है; उसका जिनके चरण संसारसागरको पार करनेके लिये नौकाके समान हैं, उन श्रीहरिमें सुदृढ़ अनुराग हो जाता है॥ ३९॥✎ 411
अनुदिनमिदमादरेण शृण्वन्
पृथुचरितं प्रथयन् विमुक्तसंगः।
भगवति भवसिन्धुपोतपादे
स च निपुणां लभते रतिं मनुष्यः॥ ३९
जो पुरुष इस पृथु-चरितका प्रतिदिन आदरपूर्वक निष्कामभावसे श्रवण और कीर्तन करता है; उसका जिनके चरण संसारसागरको पार करनेके लिये नौकाके समान हैं, उन श्रीहरिमें सुदृढ़ अनुराग हो जाता है॥ ३९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.23.39 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 523) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/23/39/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#411 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्में