श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! महाराज पृथुके बाद उनके पुत्र परम यशस्वी विजिताश्व राजा हुए। उनका अपने छोटे भाइयोंपर बड़ा स्नेह था, इसलिये उन्होंने चारोंको एक-एक दिशाका अधिकार सौंप दिया॥ १॥
विजिताश्वोऽधिराजाऽऽसीत्पृथुपुत्रः पृथुश्रवाः।
यवीयोभ्योऽददात्काष्ठा भ्रातृभ्यो भ्रातृवत्सलः॥ १
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! महाराज पृथुके बाद उनके पुत्र परम यशस्वी विजिताश्व राजा हुए। उनका अपने छोटे भाइयोंपर बड़ा स्नेह था, इसलिये उन्होंने चारोंको एक-एक दिशाका अधिकार सौंप दिया॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.24.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 524) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/24/1/