श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.24.40

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

अर्थलिंगाय नभसे नमोऽन्तर्बहिरात्मने

नमः पुण्याय लोकाय अमुष्मै भूरिवर्चसे॥ ४०

arthaliṃgāya nabhase namo'ntarbahirātmane

namaḥ puṇyāya lokāya amuṣmai bhūrivarcase|| 40

अर्थ

आप ही अपने गुण शब्दके द्वारा—समस्त पदार्थोंका ज्ञान करानेवाले तथा बाहर-भीतरका भेद करनेवाले आकाश हैं तथा आप ही महान् पुण्योंसे प्राप्त होनेवाले परम तेजोमय स्वर्ग-वैकुण्ठादि लोक हैं; आपको पुनः-पुनः नमस्कार है॥ ४०॥✎ 1333 1334

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1333 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): अभि-व्यक्ति → अभिव्यक्ति
  • #1334 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): प्रकार-की → प्रकारकी

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