आप ही अपने गुण शब्दके द्वारा—समस्त पदार्थोंका ज्ञान करानेवाले तथा बाहर-भीतरका भेद करनेवाले आकाश हैं तथा आप ही महान् पुण्योंसे प्राप्त होनेवाले परम तेजोमय स्वर्ग-वैकुण्ठादि लोक हैं; आपको पुनः-पुनः नमस्कार है॥ ४०॥✎ 13331334
अर्थलिंगाय नभसे नमोऽन्तर्बहिरात्मने
नमः पुण्याय लोकाय अमुष्मै भूरिवर्चसे॥ ४०
आप ही अपने गुण शब्दके द्वारा—समस्त पदार्थोंका ज्ञान करानेवाले तथा बाहर-भीतरका भेद करनेवाले आकाश हैं तथा आप ही महान् पुण्योंसे प्राप्त होनेवाले परम तेजोमय स्वर्ग-वैकुण्ठादि लोक हैं; आपको पुनः-पुनः नमस्कार है॥ ४०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.24.40 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 528) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/24/40/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#1333 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): अभि-व्यक्ति → अभिव्यक्ति
#1334 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): प्रकार-की → प्रकारकी