आप पितृलोककी प्राप्ति करानेवाले प्रवृत्ति-कर्मरूप और देवलोककी प्राप्तिके साधन निवृत्ति-कर्मरूप हैं तथा आप ही अधर्मके फलस्वरूप दुःखदायक मृत्यु हैं; आपको नमस्कार है॥ ४१॥✎ 13331334
प्रवृत्ताय निवृत्ताय पितृदेवाय कर्मणे।
नमोऽधर्मविपाकाय मृत्यवे दुःखदाय च॥ ४१
आप पितृलोककी प्राप्ति करानेवाले प्रवृत्ति-कर्मरूप और देवलोककी प्राप्तिके साधन निवृत्ति-कर्मरूप हैं तथा आप ही अधर्मके फलस्वरूप दुःखदायक मृत्यु हैं; आपको नमस्कार है॥ ४१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.24.41 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 528) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/24/41/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#1333 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): अभि-व्यक्ति → अभिव्यक्ति
#1334 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): प्रकार-की → प्रकारकी