श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.24.42

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

नमस्त आशिषामीश मनवे कारणात्मने।

नमो धर्माय बृहते कृष्णायाकुण्ठमेधसे।

पुरुषाय पुराणाय सांख्ययोगेश्‍वराय च॥ ४२

namasta āśiṣāmīśa manave kāraṇātmane|

namo dharmāya bṛhate kṛṣṇāyākuṇṭhamedhase|

puruṣāya purāṇāya sāṃkhyayogeśvarāya ca|| 42

अर्थ

नाथ! आप ही पुराणपुरुष तथा सांख्य और योगके अधीश्‍वर भगवान् श्रीकृष्ण हैं; आप सब प्रकारकी कामनाओंकी पूर्तिके कारण, साक्षात् मन्त्रमूर्ति और महान् धर्मस्वरूप हैं; आपकी ज्ञानशक्ति किसी भी प्रकार कुण्ठित होनेवाली नहीं है; आपको नमस्कार है, नमस्कार है॥ ४२॥✎ 1333 1334

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1333 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): अभि-व्यक्ति → अभिव्यक्ति
  • #1334 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): प्रकार-की → प्रकारकी

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