श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.24.57

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

क्षणार्धेनापि तुलये न स्वर्गं नापुनर्भवम्।

भगवत्संगिसंगस्य१ मर्त्यानां किमुताशिषः॥ ५७

kṣaṇārdhenāpi tulaye na svargaṃ nāpunarbhavam|

bhagavatsaṃgisaṃgasya martyānāṃ kimutāśiṣaḥ|| 57

अर्थ

ऐसे भगवान्‌के प्रेमी भक्तोंका यदि आधे क्षणके लिये भी समागम हो जाय तो उसके सामने मैं स्वर्ग और मोक्षको कुछ नहीं समझता; फिर मर्त्यलोकके तुच्छ भोगोंकी तो बात ही क्या है॥ ५७॥✎ 414

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—संगानां।

    (मुद्रित पृष्ठ 530)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #414 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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