ऐसे भगवान्के प्रेमी भक्तोंका यदि आधे क्षणके लिये भी समागम हो जाय तो उसके सामने मैं स्वर्ग और मोक्षको कुछ नहीं समझता; फिर मर्त्यलोकके तुच्छ भोगोंकी तो बात ही क्या है॥ ५७॥✎ 414
क्षणार्धेनापि तुलये न स्वर्गं नापुनर्भवम्।
भगवत्संगिसंगस्य मर्त्यानां किमुताशिषः॥ ५७
ऐसे भगवान्के प्रेमी भक्तोंका यदि आधे क्षणके लिये भी समागम हो जाय तो उसके सामने मैं स्वर्ग और मोक्षको कुछ नहीं समझता; फिर मर्त्यलोकके तुच्छ भोगोंकी तो बात ही क्या है॥ ५७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.24.57 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 530) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/24/57/