॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.24.58
अथानघाङ्घ्रेस्तव कीर्तितीर्थयो-
रन्तर्बहिःस्नानविधूतपाप्मनाम् ।
भूतेष्वनुक्रोशसुसत्त्वशीलिनां
स्यात्संगमोऽनुग्रह एष नस्तव॥ ५८
athānaghāṅghrestava kīrtitīrthayo-
rantarbahiḥsnānavidhūtapāpmanām |
bhūteṣvanukrośasusattvaśīlināṃ
syātsaṃgamo'nugraha eṣa nastava|| 58
अर्थ
प्रभो! आपके चरण सम्पूर्ण पापराशिको हर लेनेवाले हैं। हम तो केवल यही चाहते हैं कि जिन लोगोंने आपकी कीर्ति और तीर्थ (गंगाजी)-में आन्तरिक और बाह्य स्नान करके मानसिक और शारीरिक दोनों प्रकारके पापोंको धो डाला है तथा जो जीवोंके प्रति दया, राग-द्वेषरहित चित्त तथा सरलता आदि गुणोंसे युक्त हैं, उन आपके भक्तजनोंका संग हमें सदा प्राप्त होता रहे। यही हमपर आपकी बड़ी कृपा होगी॥ ५८॥✎ 414