श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.24.77

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

विन्दते पुरुषोऽमुष्माद्यद्यदिच्छत्यसत्वरम्।

मद्गीतगीतात्सुप्रीताच्छ्रेयसामेकवल्लभात्॥ ७७

vindate puruṣo'muṣmādyadyadicchatyasatvaram|

madgītagītātsuprītācchreyasāmekavallabhāt|| 77

अर्थ

भगवान् ही सम्पूर्ण कल्याणसाधनोंके एकमात्र प्यारे—प्राप्तव्य हैं। अतः मेरे गाये हुए इस स्तोत्रके गानसे उन्हें प्रसन्‍न करके वह स्थिरचित्त होकर उनसे जो कुछ चाहेगा, प्राप्त कर लेगा॥ ७७॥✎ 416

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #416 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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