श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.24.78

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

इदं यः कल्य उत्थाय प्राञ्जलिः श्रद्धयान्वितः।

शृणुयाच्छ्रावयेन्मर्त्यो मुच्यते कर्मबन्धनैः॥ ७८

idaṃ yaḥ kalya utthāya prāñjaliḥ śraddhayānvitaḥ|

śṛṇuyācchrāvayenmartyo mucyate karmabandhanaiḥ|| 78

अर्थ

जो पुरुष उषःकालमें उठकर इसे श्रद्धापूर्वक हाथ जोड़कर सुनता या सुनाता है, वह सब प्रकारके कर्मबन्धनोंसे मुक्त हो जाता है॥ ७८॥✎ 416

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #416 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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