जो पुरुष उषःकालमें उठकर इसे श्रद्धापूर्वक हाथ जोड़कर सुनता या सुनाता है, वह सब प्रकारके कर्मबन्धनोंसे मुक्त हो जाता है॥ ७८॥✎ 416
इदं यः कल्य उत्थाय प्राञ्जलिः श्रद्धयान्वितः।
शृणुयाच्छ्रावयेन्मर्त्यो मुच्यते कर्मबन्धनैः॥ ७८
जो पुरुष उषःकालमें उठकर इसे श्रद्धापूर्वक हाथ जोड़कर सुनता या सुनाता है, वह सब प्रकारके कर्मबन्धनोंसे मुक्त हो जाता है॥ ७८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.24.78 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 533) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/24/78/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)