राजा पुरंजन अपने रहनेयोग्य स्थानकी खोजमें सारी पृथ्वीमें घूमा; फिर भी जब उसे कोई अनुरूप स्थान न मिला, तब वह कुछ उदास-सा हो गया॥ ११॥
सोऽन्वेषमाणः शरणं बभ्राम पृथिवीं प्रभुः।
नानुरूपं यदाविन्ददभूत्स विमना इव॥ ११
राजा पुरंजन अपने रहनेयोग्य स्थानकी खोजमें सारी पृथ्वीमें घूमा; फिर भी जब उसे कोई अनुरूप स्थान न मिला, तब वह कुछ उदास-सा हो गया॥ ११॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.25.11 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 534) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/25/11/