उसे तरह-तरहके भोगोंकी लालसा थी; उन्हें भोगनेके लिये उसने संसारमें जितने नगर देखे, उनमेंसे कोई भी उसे ठीक न जँचा॥ १२॥
न साधु मेने ताः सर्वा भूतले यावतीः पुरः।
कामान् कामयमानोऽसौ तस्य तस्योपपत्तये॥ १२
उसे तरह-तरहके भोगोंकी लालसा थी; उन्हें भोगनेके लिये उसने संसारमें जितने नगर देखे, उनमेंसे कोई भी उसे ठीक न जँचा॥ १२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.25.12 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 534) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/25/12/