श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.25.2

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

रुद्रगीतं भगवतः स्तोत्रं सर्वे प्रचेतसः।

जपन्तस्ते तपस्तेपुर्वर्षाणामयुतं जले॥ २

rudragītaṃ bhagavataḥ stotraṃ sarve pracetasaḥ|

japantaste tapastepurvarṣāṇāmayutaṃ jale|| 2

अर्थ

सब-के-सब प्रचेता जलमें खड़े रहकर भगवान् रुद्रके बताये स्तोत्रका जप करते हुए दस हजार वर्षतक तपस्या करते रहे॥ २॥✎ 417

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #417 शब्दोंके बीचका स्थान: प्रकारभगवान् → प्रकार भगवान्

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