श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.25.3

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

प्राचीनबर्हिषं क्षत्तः कर्मस्वासक्तमानसम्।

नारदोऽध्यात्मतत्त्वज्ञः कृपालुः प्रत्यबोधयत्॥ ३

prācīnabarhiṣaṃ kṣattaḥ karmasvāsaktamānasam|

nārado'dhyātmatattvajñaḥ kṛpāluḥ pratyabodhayat|| 3

अर्थ

इन दिनों राजा प्राचीनबर्हिका चित्त कर्मकाण्डमें बहुत रम गया था। उन्हें अध्यात्मविद्या-विशारद परम कृपालु नारदजीने उपदेश दिया॥ ३॥✎ 417

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #417 शब्दोंके बीचका स्थान: प्रकारभगवान् → प्रकार भगवान्

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