श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.25.26

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

का त्वं कञ्जपलाशाक्षि कस्यासीह कुतः सति।

इमामुपपुरीं भीरु किं चिकीर्षसि शंस मे॥ २६

kā tvaṃ kañjapalāśākṣi kasyāsīha kutaḥ sati|

imāmupapurīṃ bhīru kiṃ cikīrṣasi śaṃsa me|| 26

अर्थ

‘कमलदललोचने’! मुझे बताओ तुम कौन हो, किसकी कन्या हो? साध्वी! इस समय आ कहाँसे रही हो, भीरु! इस पुरीके समीप तुम क्या करना चाहती हो?॥ २६॥

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