॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.25.28
त्वं ह्रीर्भवान्यस्यथ३ वाग्रमा४ पतिं
विचिन्वती किं मुनिवद्रहो वने।
त्वदङ्घ्रिकामाप्तसमस्तकामं
क्व पद्मकोशः पतितः कराग्रात्॥ २८
tvaṃ hrīrbhavānyasyatha vāgramā patiṃ
vicinvatī kiṃ munivadraho vane|
tvadaṅghrikāmāptasamastakāmaṃ
kva padmakośaḥ patitaḥ karāgrāt|| 28
अर्थ
सुन्दरि! तुम साक्षात् लज्जादेवी हो अथवा उमा, रमा और ब्रह्माणीमेंसे कोई हो? यहाँ वनमें मुनियोंकी तरह एकान्तवास करके क्या अपने पतिदेवको खोज रही हो? तुम्हारे प्राणनाथ तो ‘तुम उनके चरणोंकी कामना करती हो’, इतनेसे ही पूर्णकाम हो जायँगे। अच्छा, यदि तुम साक्षात् कमलादेवी हो, तो तुम्हारे हाथका क्रीड़ाकमल कहाँ गिर गया॥ २८॥
टिप्पणियाँ
- ३
प्रा० पा०—श्रीर्भवान्य०।
- ४
प्रा० पा०—वा उमापतिं।