श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.25.38

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

कं नु त्वदन्यं रमये ह्यरतिज्ञमकोविदम्।

असम्परायाभिमुखमश्‍वस्तनविदं पशुम्॥ ३८

kaṃ nu tvadanyaṃ ramaye hyaratijñamakovidam|

asamparāyābhimukhamaśvastanavidaṃ paśum|| 38

अर्थ

भला, आपको छोड़कर मैं और किसके साथ रमण करूँगी? दूसरे लोग तो न रति सुखको जानते हैं, न विहित भोगोंको ही भोगते हैं, न परलोकका ही विचार करते हैं और न कल क्या होगा—इसका ही ध्यान रखते हैं, अतएव पशुतुल्य हैं॥ ३८॥✎ 1336 1337

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1336 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): गृह-स्थाश्रममें → गृहस्थाश्रममें
  • #1337 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: विषय-भोगों-की → विषय-भोगोंकी

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