इसी प्रकार उस ओर नलिनी और नालिनी नामके दो द्वार और भी एक ही जगह बनाये गये थे। उनसे होकर वह अवधूतके साथ सौरभ नामक देशको जाता था॥ ४८॥✎ 13381339
नलिनी नालिनी च प्राग्द्वारावेकत्र निर्मिते।
अवधूतसखस्ताभ्यां विषयं याति सौरभम्॥ ४८
इसी प्रकार उस ओर नलिनी और नालिनी नामके दो द्वार और भी एक ही जगह बनाये गये थे। उनसे होकर वह अवधूतके साथ सौरभ नामक देशको जाता था॥ ४८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.25.48 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 538) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/25/48/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#1338 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ति → निऋर्ऋति
#1339 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋति → निर्ऋति