पुरीके दक्षिणकी ओर जो पितृहू नामका द्वार था, उसमें होकर राजा पुरंजन श्रुतधरके साथ दक्षिणपांचाल देशको जाता था॥ ५०॥✎ 13381339
पितृहूर्नृप पुर्या द्वार्दक्षिणेन पुरंजनः।
राष्ट्रं दक्षिणपंचालं याति श्रुतधरान्वितः॥ ५०
पुरीके दक्षिणकी ओर जो पितृहू नामका द्वार था, उसमें होकर राजा पुरंजन श्रुतधरके साथ दक्षिणपांचाल देशको जाता था॥ ५०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.25.50 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 538) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/25/50/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#1338 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ति → निऋर्ऋति
#1339 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋति → निर्ऋति