जब कभी अपने प्रधान सेवक विषूचीनके साथ अन्तःपुरमें जाता, तब उसे स्त्री और पुत्रोंके कारण होनेवाले मोह, प्रसन्नता एवं हर्ष आदि विकारोंका अनुभव होता॥ ५५॥
स यर्ह्यन्तःपुरगतो विषूचीनसमन्वितः।
मोहं प्रसादं हर्षं वा याति जायात्मजोद्भवम्॥ ५५
जब कभी अपने प्रधान सेवक विषूचीनके साथ अन्तःपुरमें जाता, तब उसे स्त्री और पुत्रोंके कारण होनेवाले मोह, प्रसन्नता एवं हर्ष आदि विकारोंका अनुभव होता॥ ५५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.25.55 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 539) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/25/55/