उसका चित्त तरह-तरहके कर्मोंमें फँसा हुआ था और काम-परवश होनेके कारण वह मूढ़ रमणीके द्वारा ठगा गया था। उसकी रानी जो-जो काम करती थी, वही वह भी करने लगता था॥ ५६॥
एवं कर्मसु संसक्तः कामात्मा वञ्चितोऽबुधः।
महिषी यद्यदीहेत तत्तदेवान्ववर्तत॥ ५६
उसका चित्त तरह-तरहके कर्मोंमें फँसा हुआ था और काम-परवश होनेके कारण वह मूढ़ रमणीके द्वारा ठगा गया था। उसकी रानी जो-जो काम करती थी, वही वह भी करने लगता था॥ ५६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.25.56 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 539) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/25/56/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1035 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): वंञ्चितोऽबुध:। → वञ्चितोऽबुधः।