श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.25.56

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

एवं कर्मसु संसक्तः कामात्मा वञ्चितोऽबुधः।✎ 1035

महिषी यद्यदीहेत तत्तदेवान्ववर्तत॥ ५६

evaṃ karmasu saṃsaktaḥ kāmātmā vañcito'budhaḥ|

mahiṣī yadyadīheta tattadevānvavartata|| 56

अर्थ

उसका चित्त तरह-तरहके कर्मोंमें फँसा हुआ था और काम-परवश होनेके कारण वह मूढ़ रमणीके द्वारा ठगा गया था। उसकी रानी जो-जो काम करती थी, वही वह भी करने लगता था॥ ५६॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1035 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): वंञ्च‌ितोऽबुध:। → वञ्चितोऽबुधः।

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