श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.25.57

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

क्‍वचित्पिबन्त्यां पिबति मदिरां मदविह्वलः।

अश्नन्त्यां क्‍वचिदश्नाति जक्षत्यां सह जक्षति॥ ५७

kvacitpibantyāṃ pibati madirāṃ madavihvalaḥ|

aśnantyāṃ kvacidaśnāti jakṣatyāṃ saha jakṣati|| 57

अर्थ

वह जब मद्यपान करती, तब वह भी मदिरा पीता और मदसे उन्मत्त हो जाता था; जब वह भोजन करती, तब आप भी भोजन करने लगता और जब कुछ चबाती, तब आप भी वही वस्तु चबाने लगता था॥ ५७॥

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