कभी उसकी प्रिया शोकाकुल होती तो आप भी अत्यन्त दीनके समान व्याकुल हो जाता; जब वह प्रसन्न होती, आप भी प्रसन्न हो जाता और उसके आनन्दित होनेपर आप भी आनन्दित हो जाता॥ ६१॥
क्वचिच्च शोचतीं जायामनुशोचति दीनवत्।
अनु हृष्यति हृष्यन्त्यां मुदितामनु मोदते॥ ६१
कभी उसकी प्रिया शोकाकुल होती तो आप भी अत्यन्त दीनके समान व्याकुल हो जाता; जब वह प्रसन्न होती, आप भी प्रसन्न हो जाता और उसके आनन्दित होनेपर आप भी आनन्दित हो जाता॥ ६१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.25.61 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 539) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/25/61/