श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.25.61

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

क्‍वचिच्च शोचतीं जायामनुशोचति दीनवत्।

अनु हृष्यति हृष्यन्त्यां मुदितामनु मोदते॥ ६१

kvacicca śocatīṃ jāyāmanuśocati dīnavat|

anu hṛṣyati hṛṣyantyāṃ muditāmanu modate|| 61

अर्थ

कभी उसकी प्रिया शोकाकुल होती तो आप भी अत्यन्त दीनके समान व्याकुल हो जाता; जब वह प्रसन्‍न होती, आप भी प्रसन्‍न हो जाता और उसके आनन्दित होनेपर आप भी आनन्दित हो जाता॥ ६१॥

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