श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.25.60

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

क्‍वचिच्छृणोति शृण्वन्त्यां पश्यन्त्यामनु पश्यति।

क्‍वचिज्जिघ्रति जिघ्रन्त्यां स्पृशन्त्यां स्पृशति क्‍वचित्॥ ६०

kvacicchṛṇoti śṛṇvantyāṃ paśyantyāmanu paśyati|

kvacijjighrati jighrantyāṃ spṛśantyāṃ spṛśati kvacit|| 60

अर्थ

कभी वह सुनने लगती तो आप भी सुनने लगता, देखती तो देखने लगता, सूँघती तो सूँघने लगता और किसी चीजको छूती तो आप भी छूने लगता॥ ६०॥

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