श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.26.22

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

परमोऽनुग्रहो दण्डो भृत्येषु प्रभुणार्पितः।

बालो न वेद तत्तन्वि बन्धुकृत्यममर्षणः॥ २२

paramo'nugraho daṇḍo bhṛtyeṣu prabhuṇārpitaḥ|

bālo na veda tattanvi bandhukṛtyamamarṣaṇaḥ|| 22

अर्थ

सेवकको दिया हुआ स्वामीका दण्ड तो उसपर बड़ा अनुग्रह ही होता है। जो मूर्ख हैं, उन्हींको क्रोधके कारण अपने हितकारी स्वामीके किये हुए उस उपकारका पता नहीं चलता॥ २२॥

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