श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.26.23

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

सा त्वं मुखं सुदति सुभ्र्वनुरागभार-

व्रीडाविलम्बविलसद्धसितावलोकम्।

नीलालकालिभिरुपस्कृतमुन्‍नसं नः

स्वानां प्रदर्शय मनस्विनि वल्गुवाक्यम्॥ २३

sā tvaṃ mukhaṃ sudati subhrvanurāgabhāra-

vrīḍāvilambavilasaddhasitāvalokam|

nīlālakālibhirupaskṛtamunnasaṃ naḥ

svānāṃ pradarśaya manasvini valguvākyam|| 23

अर्थ

सुन्दर दन्तावली और मनोहर भौंहोंसे शोभा पानेवाली मनस्विनि! अब यह क्रोध दूर करो और एक बार मुझे अपना समझकर प्रणय-भार तथा लज्जासे झुका हुआ एवं मधुर मुसकानमयी चितवनसे सुशोभित अपना मनोहर मुखड़ा दिखाओ। अहो! भ्रमरपंक्तिके समान नीली अलकावली, उन्‍नत नासिका और सुमधुर वाणीके कारण तुम्हारा वह मुखारविन्द कैसा मनोमोहक जान पड़ता है॥ २३॥

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