श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.26.6

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

तीर्थेषु प्रतिदृष्टेषु राजा मेध्यान् पशून् वने।

यावदर्थमलं लुब्धो हन्यादिति नियम्यते॥ ६

tīrtheṣu pratidṛṣṭeṣu rājā medhyān paśūn vane|

yāvadarthamalaṃ lubdho hanyāditi niyamyate|| 6

अर्थ

जिसकी मांसमें अत्यन्त आसक्ति हो, वह राजा केवल शास्त्रप्रदर्शित कर्मोंके लिये वनमें जाकर आवश्यकतानुसार अनिषिद्ध पशुओंका वध करे; व्यर्थ पशुहिंसा न करे। शास्त्र इस प्रकार उच्छृंखल प्रवृत्तिको नियन्त्रित करता है॥ ६॥✎ 418

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #418 शब्दोंके बीचका स्थान: (बंब),दो → (बंब), दो

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें