जिसकी मांसमें अत्यन्त आसक्ति हो, वह राजा केवल शास्त्रप्रदर्शित कर्मोंके लिये वनमें जाकर आवश्यकतानुसार अनिषिद्ध पशुओंका वध करे; व्यर्थ पशुहिंसा न करे। शास्त्र इस प्रकार उच्छृंखल प्रवृत्तिको नियन्त्रित करता है॥ ६॥✎ 418
तीर्थेषु प्रतिदृष्टेषु राजा मेध्यान् पशून् वने।
यावदर्थमलं लुब्धो हन्यादिति नियम्यते॥ ६
जिसकी मांसमें अत्यन्त आसक्ति हो, वह राजा केवल शास्त्रप्रदर्शित कर्मोंके लिये वनमें जाकर आवश्यकतानुसार अनिषिद्ध पशुओंका वध करे; व्यर्थ पशुहिंसा न करे। शास्त्र इस प्रकार उच्छृंखल प्रवृत्तिको नियन्त्रित करता है॥ ६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.26.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 540) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/26/6/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)