पुरंजनपुरीपर चण्डवेगकी चढ़ाई तथा कालकन्याका चरित्र
नारद उवाच
इत्थं पुरंजनं सम्यग्वशमानीय विभ्रमैः।
पुरंजनी महाराज रेमे रमयती पतिम्॥ १
itthaṃ puraṃjanaṃ samyagvaśamānīya vibhramaiḥ|
puraṃjanī mahārāja reme ramayatī patim|| 1
अर्थ
श्रीनारदजी कहते हैं—महाराज! इस प्रकार वह सुन्दरी अनेकों नखरोंसे पुरंजनको पूरी तरह अपने वशमें कर उसे आनन्दित करती हुई विहार करने लगी॥ १॥
इत्थं पुरंजनं सम्यग्वशमानीय विभ्रमैः।
पुरंजनी महाराज रेमे रमयती पतिम्॥ १
श्रीनारदजी कहते हैं—महाराज! इस प्रकार वह सुन्दरी अनेकों नखरोंसे पुरंजनको पूरी तरह अपने वशमें कर उसे आनन्दित करती हुई विहार करने लगी॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.27.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 543) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/27/1/