उसने अच्छी तरह स्नान कर अनेक प्रकारके मांगलिक शृंगार किये तथा भोजनादिसे तृप्त होकर वह राजाके पास आयी। राजाने उस मनोहर मुखवाली राजमहिषीका सादर अभिनन्दन किया॥ २॥
स राजा महिषीं राजन् सुस्नातां रुचिराननाम्।
कृतस्वस्त्ययनां तृप्तामभ्यनन्ददुपागताम्॥ २
उसने अच्छी तरह स्नान कर अनेक प्रकारके मांगलिक शृंगार किये तथा भोजनादिसे तृप्त होकर वह राजाके पास आयी। राजाने उस मनोहर मुखवाली राजमहिषीका सादर अभिनन्दन किया॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.27.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 543) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/27/2/