गन्धर्वराज चण्डवेगके उन अनुचरोंने जब राजा पुरंजनका नगर लूटना आरम्भ किया, तब उन्हें पाँच फनके सर्प प्रजागरने रोका॥ १५॥
ते चण्डवेगानुचराः पुरंजनपुरं यदा।
हर्तुमारेभिरे तत्र प्रत्यषेधत्प्रजागरः॥ १५
गन्धर्वराज चण्डवेगके उन अनुचरोंने जब राजा पुरंजनका नगर लूटना आरम्भ किया, तब उन्हें पाँच फनके सर्प प्रजागरने रोका॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.27.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 544) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/27/15/