श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.27.18

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

स एव पुर्यां मधुभुक् पंचालेषु स्वपार्षदैः।

उपनीतं३ बलिं गृह्णन् स्त्रीजितो नाविदद्भयम्॥ १८

sa eva puryāṃ madhubhuk paṃcāleṣu svapārṣadaiḥ|

upanītaṃ baliṃ gṛhṇan strījito nāvidadbhayam|| 18

अर्थ

वह इतने दिनोंतक पांचाल देशके उस नगरमें अपने दूतोंद्वारा लाये हुए करको लेकर विषय-भोगोंमें मस्त रहता था। स्त्रीके वशीभूत रहनेके कारण इस अवश्यम्भावी भयका उसे पता ही न चला॥ १८॥

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—उपानीतं।

    (मुद्रित पृष्ठ 544)

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