॥ श्रीहरिः ॥
तयैवं रममाणस्य कामकश्मलचेतसः।
क्षणार्धमिव राजेन्द्र व्यतिक्रान्तं नवं वयः॥ ५
tayaivaṃ ramamāṇasya kāmakaśmalacetasaḥ|
kṣaṇārdhamiva rājendra vyatikrāntaṃ navaṃ vayaḥ|| 5
अर्थ
राजन्! इस प्रकार कामातुर चित्तसे उसके साथ विहार करते-करते राजा पुरंजनकी जवानी आधे क्षणके समान बीत गयी॥ ५॥
तयैवं रममाणस्य कामकश्मलचेतसः।
क्षणार्धमिव राजेन्द्र व्यतिक्रान्तं नवं वयः॥ ५
राजन्! इस प्रकार कामातुर चित्तसे उसके साथ विहार करते-करते राजा पुरंजनकी जवानी आधे क्षणके समान बीत गयी॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.27.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 543) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/27/5/