श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.28.15

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

शिथिलावयवो यर्हि गन्धर्वैर्हृतपौरुषः।

यवनैररिभी राजन्‍नुपरुद्धो रुरोद ह॥ १५

śithilāvayavo yarhi gandharvairhṛtapauruṣaḥ|

yavanairaribhī rājannuparuddho ruroda ha|| 15

अर्थ

उसके अंग-प्रत्यंग ढीले पड़ गये थे तथा गन्धर्वोंने उसकी सारी शक्ति नष्ट कर दी थी; अतः जब यवन शत्रुओंने उसे जाते देखकर रोक दिया, तब वह दुःखी होकर रोने लगा॥ १५॥

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