॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.28.16
duhitṝḥ putrapautrāṃśca jāmijāmātṛpārṣadān|
svatvāvaśiṣṭaṃ yatkiñcid gṛhakośaparicchadam|| 16
अर्थ
गृहासक्त पुरंजन देह-गेहादिमें मैं-मेरेपनका भाव रखनेसे अत्यन्त बुद्धिहीन हो गया था। स्त्रीके प्रेमपाशमें फँसकर वह बहुत दीन हो गया था। अब जब इनसे बिछुड़नेका समय उपस्थित हुआ, तब वह अपने पुत्री, पुत्र, पौत्र, पुत्रवधू, दामाद, नौकर और घर, खजाना तथा अन्यान्य जिन पदार्थोंमें उसकी ममताभर शेष थी (उनका भोग तो कभीका छूट गया था), उन सबके लिये इस प्रकार चिन्ता करने लगा॥ १६-१७॥
टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—जामातृमित्रपार्षदान्।